(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

महाभारत का अरयण्क पर्व – Mahabharat Aranyak Parv in Hindi


॥ श्रीः ॥
3.78. अध्यायः 078
Mahabharata - Vana Parva - Chapter Topics
अर्जुनविनाभावेन काम्यकवने निवासमरोचयानैः पाण्डवैस्तस्मान्निर्गमननिर्धारणम् ॥ 1 ॥
Mahabharata - Vana Parva - Chapter Text

जनमेजय उवाच। 3-78-0x(1978)(18888)
भगवान्काम्यकात्पार्थे गते मे प्रपितामहे।
पाण्डवाः किमकुर्वंस्ते तमृते सव्यसाचिनम् ॥ 3-78-1(18889)
स हि तेषां महेष्वासो गतिरासीदनीकजित्।
आदित्यानां यथा विष्णुस्तथैव प्रतिभाति मे ॥ 3-78-2(18890)
तेनेन्द्रसमवीर्येण संग्रामेष्वनिवर्तिना।
विनाभूता वने वीराः कथमासन्पितामहाः ॥ 3-78-3(18891)
वैशम्पायन उवाच। 3-78-4x(1979)
गते तु पाण्डवेतात काम्यकात्सव्यसाचिनि।
बभूवुः कौरवेयास्ते दुःखशोकपरायणाः ॥ 3-78-4(18892)
आक्षिप्तसूत्रा मणयश्छिन्नपक्षा इवाण्डजाः।
अप्रीतमनसः सर्वे बभूवुरथ पाण्डवाः ॥ 3-78-5(18893)
वनं तु तदभूत्तेन हीनमक्लिष्टकर्मणा।
कुबेरेण यथाहीनं वनं चैत्ररथं तथा ॥ 3-78-6(18894)
तमृते ते नरव्याघ्राः पाण्डवा जनमेजय।
मुदमप्राप्नुवन्तो वै काम्यके न्यवसंस्तदा ॥ 3-78-7(18895)
ब्राह्मणार्थे पराक्रान्ताः शुद्धैर्वाणैर्महारथाः।
निघ्नन्तो भरतश्रेष्ठ मेध्यान्बहुविधान्मृगान् ॥ 3-78-8(18896)
नित्यंहि पुरुषव्याघ्रा वन्याहारमरिंदमाः।
प्रविसृत्य समाहृत्य ब्राह्मणेभ्यो न्यवेदयन् ॥ 3-78-9(18897)
एवं ते न्यवसंस्तत्रसोत्कणअठाः पुरुषर्षभाः।
अहृष्टमनसः सर्वेगते राजन्धनंजये ॥ 3-78-10(18898)
अथ विप्रोषितं राजन्पाञ्चाली मध्यमं पतिम्।
स्मरन्ती पाण्डवश्रेष्ठमिदं वचनमब्रवीत् ॥ 3-78-11(18899)
योऽर्जुनेनार्जुनस्तुल्यो द्विबाहुर्बहुबाहुना।
तमृते पाण्डवश्रेष्ठं वनं न प्रतिभाति मे ॥ 3-78-12(18900)
शून्यामिव प्रपश्यामि तत्रतत्र महीमिमाम्।
बह्वाश्चर्यमिदं चापि वनं कुसुमितद्रुमम् ॥ 3-78-13(18901)
न तथा रमणीयं वै तमृते सव्यसाचिनम्।
नीलाम्बुदसमप्रख्यं मत्तमातङ्गगामिनम् ॥ 3-78-14(18902)
तमृते पुण्डरीकाक्षं काम्यकं नातिभाति मे।
यस्य वा धनुषो घोषः श्रूयते चाशनिस्वनः।
न लभे शर्म वै राजन्स्मरन्ती सव्यसाचिनम् ॥ 3-78-15(18903)
तथा लालप्यमानां तां निशाम्य परवीरहा।
भीमसेनो महाराज द्रौपदीमिदमब्रवीत् ॥ 3-78-16(18904)
मनःप्रीतिकरं भद्रे यद्ब्रवीषि सुमध्यमे।
तन्म प्रीणाति हृदयममृतप्राशनोपमम् ॥ 3-78-17(18905)
यस्य दीर्घौ समौ पीनौ भुजौ परिघसन्निभौ।
मौर्वीकृतकिणौ वृत्तौ खङ्गायुधधनुर्धरौ ॥ 3-78-18(18906)
निष्काङ्गदकृतापीडौ पञ्चशीर्षाविवोरगौ।
तमृते पुरुषव्याघ्रं नष्टसूर्यमिवाम्बरम् ॥ 3-78-19(18907)
यमाश्रित्य महाबाहुं पाञ्चालाः कुरवस्तथा।
सुराणामपि यत्तानां पृतनासु न बिभ्यति ॥ 3-78-20(18908)
यस्य बाहू समाश्रित्य वयं सर्वेमहात्मनः।
मन्यामहे जितानाजौ परान्प्राप्तां च मेदिनीम् ॥ 3-78-21(18909)
तमृते फल्गुनं वीरं न लभे काम्यके धृतिम्।
पश्यामि च दिशः सर्वास्तिमिरेणावृता इव ॥ 3-78-22(18910)
ततोऽब्रवीत्साश्रुकण्ठो नकुलः पाण्डुनन्दनः।
यस्मिन्दिव्यानि कर्माणि कथयन्ति रणाजिरे।
देवा अपि युधांश्रेष्ठं तमृतेका रतिर्वने ॥ 3-78-23(18911)
उदीचीं चो दिशं गत्वा जित्वा युधि महाबलान्।
गन्धर्वमुख्याञ्शतशो हर्याँल्लेबे महाद्युतिः ॥ 3-78-24(18912)
राज्ञे तित्तिरिकल्माषाञ्श्रीमतोऽनिलरंहसः।
प्रादाद्भात्रे प्रियः प्रेम्णा राजसूये महाक्रतौ ॥ 3-78-25(18913)
तमृतेभीमधन्वानं भीमादवरजं वने।
कामये काम्यके वासं नेदानीममरोपमम् ॥ 3-78-26(18914)
सहदेव उवाच। 3-78-27x(1980)
यो धनानिन कन्याश्च युधि हित्वा महाबलान्।
`शतशो घातयित्वाऽरीन्पृतनामध्यगस्तदा'।
आजहार पुरा राज्ञे राजसूये महाक्रतौ ॥ 3-78-27(18915)
यः समेतान्मृधे जित्वायादवानमितद्युतिः।
सुभद्रामाजहारैको वासुदेवस्य संमते ॥ 3-78-28(18916)
`येनार्धराज्यमाच्छिद्य द्रुपदस्य महात्मनः।
आचार्यदक्षिणा दत्ता रणे द्रोणश्यभारत' ॥ 3-78-29(18917)
तस्य जिष्णोर्बृसीं दृष्ट्वा सून्यत्रेव निवेशने।
हृदयं मे महाराज न शाम्यात्रकदाचन ॥ 3-78-30(18918)
विनादस्माद्विवासं तु रोचयेऽहमरिंदम।
न हि नस्तमृते वीरं रमणीयमिदं वनम् ॥ 3-78-31(18919)

इति श्रीमन्महाभारते अरण्यपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि अष्टसप्ततितमोऽध्यायः ॥ 78 ॥

Mahabharata - Vana Parva - Chapter Footnotes
3-78-5 आक्षिप्तसूत्राश्छिन्नसूत्राः। अण्डजाः पक्षिणः ॥ 3-78-8 मेध्यान् यज्ञार्हान् ॥ 3-78-18 किणं आघातचिह्नम् ॥ 3-78-19 निष्काङ्गदकृतापीडौ साष्टशतं सुवर्णाः निष्कः तत्कृतेनाङ्गदेन कृतभूषणौ ॥ 3-78-30 बृसीं आसनम् ॥


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